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नाम गुम जाएगा

Posted On 7 Dec, 2017 में

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नाम गुम जाएगा
वाकई ! चालीस , पचास और साठ के दषक के नाम ढूँढना शुरु करें ,नाम यानि हम इंसानों के नाम तो मुझे नहीं लगता कि कुछ कामयाबी मिलेगी।अब वे नाम ढूँढे से नहीं मिलेंगे जो कभी घरों में बड़े प्यार और बड़े अरमानों से सगर्व रखे जाते थे
क़िस्सा ए मजमून शुरु करते हुए याद दिलाती हूँ कि आज़ादी के पहले वाले नामों पर ज़रा ग़ौर फरमाएँ, ख़ासे दिलचस्प होते थे। महिलाओं में अंगूरी, अषरफी और इमरती बाई जैसे नाम भी मिल जाते हैं;तो वहीं देवी-देवताओं,नदियों और अन्य पौराणिक नामों का अच्छा ख़ासा चलन भी देखा जाता है।उन नामों में जहाँ दुर्गा,लक्ष्मी,सरस्वती और गंगा,गोमती,नर्मदी बाइ्र्र लोकप्रिय नाम थे तो अब आद्या,आराध्या, पूजा,मनसा और गौरी जैसे नाम रखे जा रहे हैं।लड़कों में देव एक पापुलर नाम है तो लड़कियों में देवारती,देवना, देवयानी और देविका जैसे नाम आजकल ट्रेन्ड में हैं।पिछली पीढ़ी में कमला, विमला, उर्मिला,सुषीला और मंजुला चलती थीं तो अब स्कूलों के रजिस्टर उठा के देखे जाएँ तो इन नामों का तो जैसे नामोनिषान मिट चुका है।चौंकाने वाली बात ये है कि अभिभावकों,अध्यापक,अध्यापिकाओं के नाम भी इस नई पीढ़ी में पुराने वाले नहीं होंगे।अब तो श्वेता,षिल्पा,श्रुति,नेहा,सुरभि जैसे नामों की बहार है।एक-एक कक्षा में न जाने कितनी अंकिता और आकांक्षा नामधारी छात्राएँ होती हैं।राहुल और रोहित आधे अनुक्रमांकों पर कब्ज़ा किए होते हैं।
इसी तारतम्य में सुनिए कि ‘ मेरा नाम राजूघराना ’ और ‘ मेरा नाम है चमेली ’ जैसे गाने तो फिल्मों से आउट हुए ही अमिताभ वाले विजय के साथ संजय और अजय भी अब अधिक सुनाइ्र्र नहीं देते।अनिमेष, अभिनव,प्रांजल,शाष्वत,अंकित जैसे नामों की गूँज अब चहुँओर है।सिनेमा में ‘ माइ नेम इज़ शीला केजवानी ’ और ‘ जलेबीबाई ’ बनकर आइटम नम्बर तो किये जाएँगे लेकिन हकीकत में शीला,शोभा शालिनी और सुहासिनी जैसे नामों के स्थान पर ऐष्वर्या,मेघना,दीपिका और प्रियंका छाई दिखेंगी। और रही बात इमरतीबाई जलेबीबाइ्र्र और सुपारीलाल की-तो वो दिन तो अब लद ही गए। टीवी सीरियलों में रिमझिम,गुनगुन,काजल,पायल,शगुन,दीया,टीया,सौन्दर्या,लावण्या जैसे नाम दिखाई देंगे।पुलि्ंलग नामों में उमेष,सुरेष, राकेष,दिनेष,कैलाष,सुरेन्द्र,महेन्द्र,राजेन्द्र का भी ज़माना बीत गया अब तो ऋषि,ऋत्विक,ऋषभ और ऋषिकेष का ज़माना है।
कोमल,गीतिका,नयनिका,कृतिका,ऋषिका और तनिष्का जैसे नामों ने निहारिका और मधुलिका जैसे नामों को आउट किया है तो वहीं जाहृवी,पल्लवी और खुषबू जैसे नामों के चक्कर में शारदा,उपासना,ज्योति,मीना,रीना,रेखा,नंदा जैसे नाम खुद ही खिसियाकर पीछे हट चुके हैं।
नामों की दुनिया में ‘ अनकॉमन और लेटेस्ट ’ इन दो शब्दों के हिसाब से फैसला किया जाता है;चुनांचे गणेष,गणपति,षिव,विष्णु,आषुतोष के बजाए इनके वो पर्यायवाची नाम रख लिए जाते हैं जो किसी ने ना सुने हों, लिहाज़ा हेरम्ब, अभिरुप जैसे नाम रखे जाते हैं तो अदिति,अवनी,अम्बर,पुरवा साहित्यिक पर्यायवाची शब्दावली की सहायता से अपना लिए जाते हैं।
कुछ लोग पुराने ज़माने की रानी,राजकुमारी और राजा,राजकुमार जैसे नामों के स्थान पर प्रिन्स और प्रिन्सी,स्वीटी,बबली,लवली,डिम्पल,सिम्पल,बॉबी,डॉली जैसे ‘ इंग्लिष नेम ’ रखना पसंद करते हैं। वैसे नामों के मामले में हिट और फ्लॉप का भी समुचित ध्यान रखा जाता है यानि जिन नामधारियों ने आषातीत सफलताएँ अर्जित नहीं कीं उन नामों को नामकरण की फेवरिट लिस्ट में स्थान नहीं मिलता चाहे नाम शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टि से कितना ही ख़ूबसूरत क्यों न हो।
नामों की कहानी इतनी दिलचस्प न होती तो फिल्मों में ढेर-ढेर गाने ‘नाम’ को लेकर न लिखे जाते। याद कीजिए ज़रा फिल्म गँवार में राजेन्द्र कुमार वैजंतीमाला से कैसे पूछते कि ‘ ऐ फूलों की डाल ये राही पूछे एक सवाल तुम्हारा नाम क्या है,तुम्हारा नाम क्या है?’वहीं कोई लाल दुपट्टे वाली से नाम पूछने की ख़्वाहिष प्रकट करता है तो कोई तेरे नाम का दीवाना तेरे घर को भी ढूँढने निकल पड़ता है।
कुल मिलाकर इन नामों के बारे में यही कहा जा सकता है कि ‘ हरि अनंत हरि कथा अनंता ’।फेहरिस्त तो नामों की कितनी भी लंबी बनाई जा सकती है ‘ लेकिन नाम वही टिकेगा जो कुछ काम कर जाएगा ’ नहीं तो फिर इस परिवर्तनषील दुनिया और ज़माने में नाम तो एक दिन गुमेगा ही।

नाम गुम जाएगा

वाकई ! चालीस , पचास और साठ के दषक के नाम ढूँढना शुरु करें ,नाम यानि हम इंसानों के नाम तो मुझे नहीं लगता कि कुछ कामयाबी मिलेगी।अब वे नाम ढूँढे से नहीं मिलेंगे जो कभी घरों में बड़े प्यार और बड़े अरमानों से सगर्व रखे जाते थे

क़िस्सा ए मजमून शुरु करते हुए याद दिलाती हूँ कि आज़ादी के पहले वाले नामों पर ज़रा ग़ौर फरमाएँ, ख़ासे दिलचस्प होते थे। महिलाओं में अंगूरी, अषरफी और इमरती बाई जैसे नाम भी मिल जाते हैं;तो वहीं देवी-देवताओं,नदियों और अन्य पौराणिक नामों का अच्छा ख़ासा चलन भी देखा जाता है।उन नामों में जहाँ दुर्गा,लक्ष्मी,सरस्वती और गंगा,गोमती,नर्मदी बाइ्र्र लोकप्रिय नाम थे तो अब आद्या,आराध्या, पूजा,मनसा और गौरी जैसे नाम रखे जा रहे हैं।लड़कों में देव एक पापुलर नाम है तो लड़कियों में देवारती,देवना, देवयानी और देविका जैसे नाम आजकल ट्रेन्ड में हैं।पिछली पीढ़ी में कमला, विमला, उर्मिला,सुषीला और मंजुला चलती थीं तो अब स्कूलों के रजिस्टर उठा के देखे जाएँ तो इन नामों का तो जैसे नामोनिषान मिट चुका है।चौंकाने वाली बात ये है कि अभिभावकों,अध्यापक,अध्यापिकाओं के नाम भी इस नई पीढ़ी में पुराने वाले नहीं होंगे।अब तो श्वेता,षिल्पा,श्रुति,नेहा,सुरभि जैसे नामों की बहार है।एक-एक कक्षा में न जाने कितनी अंकिता और आकांक्षा नामधारी छात्राएँ होती हैं।राहुल और रोहित आधे अनुक्रमांकों पर कब्ज़ा किए होते हैं।

इसी तारतम्य में सुनिए कि ‘ मेरा नाम राजूघराना ’ और ‘ मेरा नाम है चमेली ’ जैसे गाने तो फिल्मों से आउट हुए ही अमिताभ वाले विजय के साथ संजय और अजय भी अब अधिक सुनाइ्र्र नहीं देते।अनिमेष, अभिनव,प्रांजल,शाष्वत,अंकित जैसे नामों की गूँज अब चहुँओर है।सिनेमा में ‘ माइ नेम इज़ शीला केजवानी ’ और ‘ जलेबीबाई ’ बनकर आइटम नम्बर तो किये जाएँगे लेकिन हकीकत में शीला,शोभा शालिनी और सुहासिनी जैसे नामों के स्थान पर ऐष्वर्या,मेघना,दीपिका और प्रियंका छाई दिखेंगी। और रही बात इमरतीबाई जलेबीबाइ्र्र और सुपारीलाल की-तो वो दिन तो अब लद ही गए। टीवी सीरियलों में रिमझिम,गुनगुन,काजल,पायल,शगुन,दीया,टीया,सौन्दर्या,लावण्या जैसे नाम दिखाई देंगे।पुलि्ंलग नामों में उमेष,सुरेष, राकेष,दिनेष,कैलाष,सुरेन्द्र,महेन्द्र,राजेन्द्र का भी ज़माना बीत गया अब तो ऋषि,ऋत्विक,ऋषभ और ऋषिकेष का ज़माना है।

कोमल,गीतिका,नयनिका,कृतिका,ऋषिका और तनिष्का जैसे नामों ने निहारिका और मधुलिका जैसे नामों को आउट किया है तो वहीं जाहृवी,पल्लवी और खुषबू जैसे नामों के चक्कर में शारदा,उपासना,ज्योति,मीना,रीना,रेखा,नंदा जैसे नाम खुद ही खिसियाकर पीछे हट चुके हैं।

नामों की दुनिया में ‘ अनकॉमन और लेटेस्ट ’ इन दो शब्दों के हिसाब से फैसला किया जाता है;चुनांचे गणेष,गणपति,षिव,विष्णु,आषुतोष के बजाए इनके वो पर्यायवाची नाम रख लिए जाते हैं जो किसी ने ना सुने हों, लिहाज़ा हेरम्ब, अभिरुप जैसे नाम रखे जाते हैं तो अदिति,अवनी,अम्बर,पुरवा साहित्यिक पर्यायवाची शब्दावली की सहायता से अपना लिए जाते हैं।

कुछ लोग पुराने ज़माने की रानी,राजकुमारी और राजा,राजकुमार जैसे नामों के स्थान पर प्रिन्स और प्रिन्सी,स्वीटी,बबली,लवली,डिम्पल,सिम्पल,बॉबी,डॉली जैसे ‘ इंग्लिष नेम ’ रखना पसंद करते हैं। वैसे नामों के मामले में हिट और फ्लॉप का भी समुचित ध्यान रखा जाता है यानि जिन नामधारियों ने आषातीत सफलताएँ अर्जित नहीं कीं उन नामों को नामकरण की फेवरिट लिस्ट में स्थान नहीं मिलता चाहे नाम शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टि से कितना ही ख़ूबसूरत क्यों न हो।

नामों की कहानी इतनी दिलचस्प न होती तो फिल्मों में ढेर-ढेर गाने ‘नाम’ को लेकर न लिखे जाते। याद कीजिए ज़रा फिल्म गँवार में राजेन्द्र कुमार वैजंतीमाला से कैसे पूछते कि ‘ ऐ फूलों की डाल ये राही पूछे एक सवाल तुम्हारा नाम क्या है,तुम्हारा नाम क्या है?’वहीं कोई लाल दुपट्टे वाली से नाम पूछने की ख़्वाहिष प्रकट करता है तो कोई तेरे नाम का दीवाना तेरे घर को भी ढूँढने निकल पड़ता है।

कुल मिलाकर इन नामों के बारे में यही कहा जा सकता है कि ‘ हरि अनंत हरि कथा अनंता ’।फेहरिस्त तो नामों की कितनी भी लंबी बनाई जा सकती है ‘ लेकिन नाम वही टिकेगा जो कुछ काम कर जाएगा ’ नहीं तो फिर इस परिवर्तनषील दुनिया और ज़माने में नाम तो एक दिन गुमेगा ही।

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